वो एक पागल सा लड़का है, मै एक झल्ली सी लड़की हूँ….!!

वो कम कम बातें करता है,
मै बातूनी सी रहती हूँ ,
वो एक पागल सा लड़का है,
मैं एक झल्ली सी लड़की हूँ!!

वो व्यस्त सहर की पुरवैय्या सा
मुझमे बहता रहता है,
मैं उसी सहर की शाम बनी
उसके दिल में ढलती हूँ !!
वो एक पागल सा लड़का है
मै एक झल्ली सी लड़की हूँ!!

वो राजीनति-ओ-दुनियादारी
सबकी खबरें रखता है,
मै खुद की हाल-ऐ- दिल अपना
चुप होकर खोजा करती हूँ!!
वो एक पागल सा लड़का है,
मैं एक झल्ली सी लड़की हूँ!!

वो किसी आँगन के शज़र के जैसा
जिम्मेदार खड़ा सा रहता है,
मै उस पर बैठी चिड़िया जैसे
अल्हड़पन में रहती हूँ!!
वो एक पागल सा लड़का है,
मै एक झल्ली सी लड़की हूँ!!

वो सीप का सच्चा मोती है ,
जो की समुद्र में मिलता है ,
मैं बहता दरिया हूँ छोटा
उस समुद्र में जाकर मिलती हूँ,
वो एक सच्चा सा लड़का है ,
मैं एक झल्ली सी लड़की हूँ !!
आफरीन बानो

कभी कभी कह देना अच्छा होता है…

कभी कभी कह देना अच्छा होता है!

वो बाते जो, कही जा सकती हैं मगर हम फिर भी हम उन्हें मन में रखते हैं, वो बन जाती हैं बोझ,
वो बोझ जो एक वक़्त के बाद संभाले नहीं संभलता!!
कभी कभी कहने सुनने में जो बाते छूट जाती हैं वही बन जाती हैं दरार और उन्ही दरारों से ज़िन्दगी कब निकल जाती है पता नहीं चलता!!

ज़िन्दगी…

कब कहा किस मोड़ पे साथ छोड़ दे किसे पता ?
मगर फिर भी हम करते है ज़िन्दगी भर की तैयारी, जैसे हमको बरसो जीना हो,
जो पल आज हमारे पास है उन्हें हम भविष्य के लिए त्याग रहे है, वो भविष्य जिसका अता पता भी नहीं!!
अगर सोचा जाए जो ज़िन्दगी एक वक़्त के बाद भागने लगती है, और हम उसके पीछे पीछे भागते है, हम सबकुछ बटोरना चाहते है, खूब सारे रिश्ते बना लेते है, चाहे निभा पाए या नहीं, हमें लगता है ज़िन्दगी का मकसद है ज़्यादा से ज़्यादा रिश्ते होना,इसी चाह में हम बनाते जाते हैं रिश्ते,

रिश्ता..
चाहे कोई भी हो, एक उम्मीद से बंधा होता है, हम अक्सर उन्हें पूरा नहीं कर पाते, फिर सहारा लेते है मजबूरियों का, रिश्ता दम तोड़ देता है, फिर हम होते है निराश, और कोसते है खुद को!!
ज़िन्दगी क्या है ?
अलग अलग लोगों से पूछिए अलग अलग जवाब हांसिल होंगे!!
ज़िन्दगी मुट्ठी में दबी वो रेत है, जिसे जितना भी ज़ोर से पकड़ लो, मगर फिसलती रहती है, या शायद तितली के उन रंगबिरंगे पंखो सी है ज़िन्दगी जो एक वक़्त के बाद रंग छोड़ देती है!! ज़िन्दगी आसमान और धरती के बीच सिला हुआ छितिज़ है!!
पिंजरे में कैद परिंदे के लिए आज़ादी ही ज़िन्दगी है!
और एक आवारा व्यक्ति के लिए बंदिश!
ज़िन्दगी तो हमारे पास भी है मगर हम उसे बस काट रहे है,
ज़िन्दगी गुजारने और काटने में उतना ही फर्क है जितना जीने और मरने में!!
सबकी ज़िन्दगी का अलग अलग मकसद है, कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई इंजीनियर, मगर क्या यही असल मकसद है ??
मेरे ख्याल से तो नही….
हाँ थोड़ा फिल्मी जरूर लगेगा आपको मगर
मेरे लिए ज़िन्दगी का मकसद
है “ख़ुशी’ और मौजूदा रिश्तो को निभाना, उन्हें निभाते रहना!!
हाँ ख़ुशी का जरिया क्या है ये अलग बात है!!
हो सकता है डॉक्टर बनना ही मेरी ख़ुशी का जरिया हो, या कुछ और….
खैर…
फिलहाल तो ये हाँथ में थामी हुई चाय ही ‘ख़ुशी’ है जोकी अब ठंडी हो चुकी है!!
आप भी तलाशिये ज़िन्दगी का मकसद और वजह ढूढ़िए खुश रहने की ,क्युकी बहुत छोटी है ज़िन्दगी!!
आफरीन बानो

छोड़ आये हैं ….

जहां से गुज़रा करता था काफ़िला प्यार का अपना ,
एक शख्श रूठा हम
उन गलियों मेँ छोड़ आए हैं…..!!

जिनसे महकती थी कभी शाम-ओ-सहर मेरी ,
उन नाज़ुक सी कलियों का जवां दिल तोड़ आए हैं ..!!

रह रह के गुज़री है इधर,एक उम्र आँखों से मेरे ,
एक लम्हा उधर उनके भी दिल मेँ,
गुजरता छोड़ आए हैं …

एक शख्श रूठा हम उन गलियों मेँ छोड़ आए हैं !!

आफरीन बानो

व्यथा: एक परिंदे की…

नन्हे-नन्हे पंखो से वो,उड़ने की कोशिश करता था,
नर्म रूई,कपास के जैसा,एक चिड़िया का वो बच्चा था,

नई,मस्त सी भोर थी वो,
जब वो उड़ना सीख रहा था,
जीवन को जीने का पहला,
ढंग वो नन्हा सीख रहा था!

उड़ने की जब चढ़ी ख़ुमारी,
देखना चाही दुनिया सारी
टूटा-फूटा, फुदक-फुदक
डाली-डाली, इधर-उधर!

उड़ने की कोशिश में वो,
अनजान जगह पर जा बैठा,
दूर चला आया अपनो से,
घर की डाली खो बैठा!

इधर-उधर कुछ फुदका वो
उड़-उड़कर फिर रूकता वो,
घर जाने को बेसब्र सा मन
मूक ही असफल रोया वो!

अनजान परिन्दे देख वहाँ
छोटा सा दिल सहम गया,
जतन किये घर जाने को
फिर थक कोने में बैठ गया!

बेसब्र,थकी निगाहें उसकी,
गलियाँ घर की ढूंढ रही थी,
माँ के पंखो की गर्मी,
मन मे उसके घूम रही थी!

भर हौसला पंखो में,
फिर थोड़ा सा उड़ पाया,
जैसे ही पंख पसारे,
यादों से फिर टकराया!

जमीं पे फिर जा गिरा
चोट हौसलों को आई,
मायूसी भरकर फिर दिल में
लम्हों को सब व्यथा सुनाई!

उड़ना तो था ही उसको,
पर साथ ही लड़ना सीख रहा था,
जीवन को जीने का पहला,
ढंग वो नन्हा सीख रहा था!

बीत गए सब दिन ऐसे ही,
रोज प्रयत्न भी जारी था,
सीख रहा था खुद से लड़ना
लम्हा-लम्हा भारी था!

देख परिन्दों को उड़ता,
मन उसका भी ललचाया,
क्यों नही उड़ सकता है वो
सवाल ज़हन में ये आया!

खो बैठा है जिन लम्हों को
उनको लेकर पछताया,
उड़ना है अब उसको भी,
मन ने ठाना,जिद पर आया!

थामी सांस,उड़ान भरी,
हौसले लेकर साथ सभी,
हौसलों ने कर दिखाया,
आखिरकार,
वो नन्हा उड़ पाया!!

अब पंख फैलाकर खुले गगन में
दूर उड़ाने भरता था,
शरीर भले छोटा सा था पर,
बड़े इरादे रखता था!

नन्हे-नन्हे पंखो से वो,उड़ने की कोशिश करता था,
नर्म रूई,कपास के जैसा,एक चिड़िया का वो बच्चा था!!

आफरीन बानो

“तुम मेरी जिंदगी के चाँद हो”  

“तुम मेरी जिंदगी के चाँद हो”

तुम मेरे लिए ठीक वैसे ही हो जैसे सुर्ख आसमान मे चमकता हुआ सफेद चाँद !!

उसकी चांदनी जब बेला के पौधे के श्वेत फूलों पर पड़ती है तो, लगता है मानो छोटे छोटे चाँद उग आए हों उस पौधे पर !

ऐसी भीनी रोशनी जो आँखों को सुकून दे !

मै हमेशा चहती थी मेरी जिंदगी मेँ कोई शख्स

हो जिसकी तुलना चाँद से की जाए !!
ठीक वैसे ही जैसे आज चाँद पर नजर पड़ जाए तो जहन मे तुम्हारा नाम आ जाता है!!

यूं तो हमारे तुम्हारे दरमियाँ गिले शिकवे भी कम नहीं मगर ,तुम्हारी वही जगह दिल मेँ मेह्फूज है अरसों से !!
दिल आज भी कुछ धड़कन ज्यादा धड़क उठता है तुम्हरी मुस्कुराहट पर,
“तुम्हारे सिवा किसी के साथ .होने का ख्याल भी अब गवारा नही ”

मुझे अब हर मुस्कुराती चीज मेँ तुम्हरा अक्श दिखता है ,चाहे वो कोई रंग बिरंगी तितली हो या गुलाब के फूल पर जमी ओस की बूंदे!
कभी कभी सोचती हूँ काश हम दोनो एक ही आसमान के नीचे लेटे हुए एक ही चाँद को देख पाते !!
साज समाज और रीति रिवाजों के उलझे धागों को कुछ पल के लिए दरगुज़र कर जाते ,
और बुन पाते ढेर सारे सपने, हमारी साथ बीती यादों की मासूम ऊन से …

हम दोहरा पाते वो अनकहे किस्से जो छूट गए वक्त के हांथों,जी पाते वो लम्हे जोे छोड़ दिए वक्त के दबाव मेँ!!

मै सुना पाती तुम्हे अपनी अधूरी कविताएं जिन्हे, बस तुम पूरा कर सकते हो !

यूंही बातों-बातों मे रात ढलती जाती ,
और फिर हम एक पल को आसमानी चाँद से नजर हटाते, और अपने अपने चाँद को देख कर मुस्कुरा देते ♥
आफरीन बानो

मै…

बचपन में मुझे तितलियाँ बहुत पसंद थी !मै हमेशा उन्हें पकड़ने की कोशिश में लगी रहती थीं ! मै आज भी वैसी ही हूँ !!

आज भी तितलियाँ देख , उनके पीछे- पीछे चल पड़ती हूँ
जैसे किसी की तलाश हो मुझे !!

तितलियाँ भी कली दर कली किसी को ढूढ़ती फिरतीं होंगी शायद ; उनके पीछे भागते भागते मै कुछ वक़्त के लिए भूल जाती हूँ अपनी परेशानियाँ ,

कभी घर को आती हुई गली में एक छोटा सा पिल्ला मझे भा जाता है,जो हमेशा मुझे भूखा ही लगता है,
अम्मी से नजरें बचा के hotcase से निकाल के रोटी उसे खिला देती हूँ !!
एक गाय आती है मेरे दरवाजे पे , बिना पूछे ही उसका नाम मैंने गौरी रख दिया है,
अब शाम को 6 बजा नहीं कि गौरी का इन्तजार शुरू हो जाता है!!
छत पे एक छुई- मुई का पौधा लगाया है,
मुझे अपनी ज़िन्दगी भी उस छुई मुई सी लगती है ,
मेरी आदतों में भी शुमार है यूँ पल में मुरझाना और फिर खिल जाना!!!

कभी बाहर का मौसम खुशनुमा हुआ, तो दिल भी खुश हो जाता है,
वक़्त बेवक़्त आई बारिश अक्सर मेरी ज़िन्दगी में धूल का उड़ना कम कर जाती है !!

तेज़ बारिश में दौड़ती भागती बूंदे मेरे ज़ेहन में भी ख्यालो की तरह भागतीं हैं ,

और तेज़ झमाझम बारिश के बाद टीन से टपकते पानी की वो टप-टप मुझे बहुत सुकून देती है!!
मिट्टी की भीनी, महकती खुशबू मुझे किसी परफ्यूम से ज्यादा अच्छी लगती है!!
और फूल,
फूलों से तो जैसे कोई रिश्ता पुराना है,
लाल-पीले फूलों पर जमी ओस की बूंदें देख मेरा दिल मचल जाता है !!
मासूम लगती है मुझे खिलने की कोशिश में लगी वो गुलाब की कलियाँ !!
इसी तरह पीली चादर ओढ़े कोई सरसों का खेत,दरख्तों की एक बड़ी लम्बी कतार ,
आस्मां अपने पंखों में समेटे उड़ते परिन्दें , और हल्की हरी घांस का वो अकेले सा मैदान
मुझे बहुत अच्छे लगते हैं!!!

मुझे नहीं चाहिए, किसी बड़े से showroom से लाया हुआ वो नकली फूलों का गुलदस्ता,
बजाय एक नीरस,बेजान गुलदस्ते के मै एक छोटा सा पौधा अपनाना पसंद करुँगी जिसमे दो पत्तियां लगी मुस्कुरा रही हों,जिनमे आशा हो खिलने की!

एक archies के महंगे खिलौने से बेहतर लगती है मुझे किसी के हांथों से बनी वो रंग बिरंगी गुड़िया, जो दिवाली के दिनों में सड़क के किनारे बिका करती हैं,वो छोटे छोटे, आधे अधूरे रंगे मिट्टी के बर्तन जिनको छूते ही थोड़ा रंग हाँथ में लग जाता है !!

किसी महंगे,imported उपहार से बेहतर है कागज़ के टुकड़े पे मेरे लिए लिखी हुई वो आधी – अधूरी लाइन्स जिन्हे पढ़ते हुए मै मुस्कुरा दूँगी क्युकी मुझे एहसास होगा अपनेपन का!!

शायद ,
मै अजीब हूँ, अच्छी या बुरी नहीं जानती ..
मै चाहती हूँ ऐसे रिश्तें जो मुझे मेरी तरह ही स्वीकारे,
जिनके दिल में मुझे बदलने की रत्ती भर भी ख्वाहिश न हो!!
जिनसे बंधी रहे मेरी खुशियों की डोर,जो मुझे वजह दें खुश रेह्ने की ..
कोई भी इंसान perfect नहीं होता
लिहाजा मै भी नहीं हूँ,
मगर बजाय ऐसे लोगों के जो हमेशा मुझमे कमियां तलाशते रहे,
मै चाहती हूँ ऐसे लोग जो मेरी खूबियों को पहचानें,

वो लोग जो जिनके लिए मै imperfectly perfect ही बेहतर हूँ

ऐसे रिश्तों को मै निभाऊंगी दिल से, और बेहतर निभा पाने की ख्वाहिश दिल में रक्खूंगी ….

आफरीन बानो