अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस..

उर्दू घर की ज़ाया हूँ ,
इश्क़ ,हिंदी से करती हूँ ,
हिन्दुस्तान वतन है मेरा ,
मै हिंदी की बेटी हूँ ,

हिन्दी से ही भारत माँ की
भावनाओं को शब्द मिले,
रस पाये इस संस्कृति ने ,
परम्परा को रंग मिले ,

हिन्दी तुमने शब्द दिए हैं,
तुम्ही को अर्पित करती हूँ ,
हिन्दुस्तान वतन है मेरा ,
मै हिंदी की बेटी हूँ ….!!

वीरों की विजयगाथाओं में
छुपा इतिहास तुम्हारा है
हिंदी,तुमसे भारत माँ का
बंधन बहुत पुराना है

अमर रहो तुम ह्रदय में सबके ,
यही कामना करती हूँ ,
हिन्दुस्तान वतन है मेरा ,
मै हिंदी की बेटी हूँ ….!!

हिन्दुस्तान वतन है मेरा ,
मै हिंदी की बेटी हूँ ….!!
-:आफरीन बानो

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
(21 फ़रवरी )

Advertisements

दिल्ली में एक आठ महीने कि बच्ची के साथ बलात्कार हुआ!
हरियाणा में एक १० साल की बच्ची ने बलात्कार के बाद ख़ुद को जिन्दा जलाया!
फरीदाबाद में एक 3० साल के लड़के ने २३ साल की महिला के साथ बलात्कार किया!

कहीं किसी दामिनी ने दम तोड़ा;

तॊ कहीं किसी निर्भया को बलात्कार कर चलती बस से फेंक दिया गया !!
पर इन सब में नया क्या है?

घटनाएं वहीं हैं बस नाम बदलते रहते हैं !!

इन्सानियत शायद खत्म हो गई है या कहीं व्यस्त है!
शायद इन्सानियत व्यस्त है साम्प्रदायिक दंगो को हवा देने में !!

या तुम सबको शायद फर्क नहीं पड़ता जब कोई आशिफा अपनी जान खो बैठती है ;शायद तुम्हारे लिए ये मुद्दे इतने बड़े नहीं

तो तुम लोग लगे रहो,
तुम लोग लगे रहो कश्मीर को अपना बनाने में !
तुम लोग लगे रहो दंगे करने में,खून बहाओ,मारो लोगों को!
तुम लोग लगे रहो हिंदू-मुस्लिम के नाम पर बेगुनाहों को मारने में,
तुम लोग लड़ते रहो राम मन्दिर और बाबरी मस्जिद के हक़ के लिए !
लड़ते रहो, मरते रहो, खत्म कर दो इन्सानियत और ले लो हक में मन्दिर और मस्जिद को!!
फिर उसी जन्मभूमि पर, जहाँ तुमने जाने कितनी ही जाने ले ली,कितने ही दंगे करवाए…
हाँ उसी भूमि पर बनवा लो मस्जिद, उसी जगह हजारों का खून बहाने के बाद,उसी मस्जिद में खड़े होके ख़ुद कि सलामती कि दुआ माँगना!
अगर खुदा अन्धा होगा और उसने उन बेगुनाहों का बहता लहु नही देखा होगा तो कुबूल कर लेगा तुम्हारी दुआ!!
क्या लिखा है किसी शरियत में कि खुदा बन्दों कि नमाज बस मस्जिद में कुबूल करेगा ? अगर ऐसा होता तो बीच रास्ते में मुसल्ला बिछाकर,काबे कि ओर रुख करके नमाज अदा करने कि मोह्लत ना अता होती हमे!

और अगर इन दंगो के निपटने के बाद जीत तुम्हारी हो जाए
और फ़ैसला तुम्हारे हक में आ जाए, तो तुम मन्दिर बनवा लेना, शायद तुम्हारा भगवान केवल घंटा बजाने से ही प्रार्थना सुनता हो, अगर उसने उन बेगुनाहों की पुकार नही सुनी होगी, तो जरुर सुन लेगा तुम्हारी प्रार्थना!

तो तुम लोग लगे रहो, और इन सबसे अगर मन भर जाए और मूड रिफ्रेश करने का मन हो, तो और भी मसले हैं!!
फेमिनिस्म पे तीर छोड़ने लग जाना,
छोटे कपड़ों और मेकअप को बलात्कार की वजह करार देना!!
देर रात बाहर निकलेंगी लड़कियाँ तो बलात्कार तो होंगे ही
इस तरह कि टिप्पणियाँ करने लग जाना!
और अगर कोई रेप केस सामने आ जाए तो पीड़ित लड़की को चरित्रहीन ठहरा देना!!
फिर दंगे करना, कैंडिल मार्च निकालना, न्याय मांगना, और अगर गलती से ४ या ५ साल बाद न्याय मिल जाए उस लड़की को तो नए केस के इन्तजार में बैठ जाना!!

तो तुम लोग लगे रहो
दंगे करो, खून बहाओ, खत्म कर दो इन्सानियत!!

तुम्हारे इन दंगो से और इन कैंडिल मार्च से किसी निर्भया की जान वापस नही आएगी, और कोई दामिनि, इसी जन्म भूमि पर रोज दम तोड़ेगी!!

Written by- Afreen bano

प्यार …

यक़ीनन प्यार का एहसास बहुत ख़ूबसूरत होता है!!
लगता है मानो बदल के फीहे टूट टूट कर बरस रहें हो !
बारिश की बूंदे भी हंसती खेलती नज़र आती हैं !
एक एक बूंद पकड़ने को जी चहता है !
पांव जमीं पर ठहरते ही नही
लगता है पूरी दुनिया इन्ही कुछ लम्हों मेँ सिमट आई हो !!
जब पूरी दुनिया तुम्हरी ओर मुस्कुराती नज़र आ रही हो
फूलों की लाली टूटकर बिखर रही हो धरा पर !
काजल कुछ ज्यादा पसंद आने लग जाता है !
पायल रोज से कुछ ज्यादा छम छम करने लगती है !!
उंगलियां हवा के तार छेड़ कर धुन बजाने लगती हैं !!
कट जाता है कभी पूरा दिन एक मुस्कान के बल पर ,
ढलते सूरज की लाली होंठों और गालों से टकराने लगती है !!

फिर अचानक छूटने लग जाते है वो एहसास ,
वो लम्हे जो समेट कर,
बचा कर रक्खे थे लम्हों की भीड़ से वो साथ छोड़ने लग जाते हैं !

वो पांव जो अब तक जमीं पर नहीं रुकते थे !!
जिस्म का सारा भार लाकर पटक देते हैं जमीं पर मुंह के भल !!

फ़ीके हो जाते हैं सब रंग
सूरज की लाली काटने दौड़ती है !!

काजल सिर्फ काला नज़र आने लगता है !!
खुद का चेहरा भी आईने मे दुन्ध्ला सा जान पड़ता है !!

वो पायल जिसकी झंकार अब तक सुकून देती थी,
पांव मे चुभने लगती हैं,
मोती टूट कर बिखरने लगते है !!

साथ छूट जाता है मगर मन मेँ छोड़ जाता है ढेरों सवाल
आखिर ….
क्यूँ होता है ऐसा ?
कैसे छोड़ देते हैं लोग इस तरह साथ ?
साथ सपने दिखा कर कैसे छोड़ देते हैं लोग उन सपनो कें साथ अकेला हमको ?
क्या इतना मुश्किल होता है निभाना या प्यार मेँ बने रहना?
कैसे तोड़ कर चल देते हैं लोग साथ पिरोई मोतियों की माला ?

प्यार ख़त्म हो जाता है अगर तो दोनो तरफ से क्यूँ नही होता ??

अगर बचपना होता है तो एक का बचपना वक्त से पहले ही चला जाता है वही अगले का ताउम्र क्यूँ नही गुजरता ?

और इन्ही सवाल, बेचैनी, नफरत और बेबसी मेँ गुजरती है आगे की उम्र !!
-आफ़रीन बानो

कर दिखाओ क़ि ….

कर दिखाओ क़ि धरा की ,
ख़ुशबुएं तुमको पुकारें ..

कर दिखाओ ताक मेँ ,
बैठा है चंदा भी तुम्हारे ,

फिर वहीं परवाज़ होगा ,
और वहीं परवान भी ,
जिनके ख़ातिर थे ना जानें ,
कबसे आतुर स्वप्न तुम्हारे…

कर दिखाओ क़ि धरा की,
ख़ुशबुएं तुमको पुकारें !!

कुछ आख़िरी सा ….

क़ि मौसम और भी गुजरेंगे तुम्हारी जिंदगी मेँ अब ,
हमेशा यूहीं मेरे प्यार की बरसात ना होगी …

कभी जो धूप आए तॊ खतों को ओढ़ लेना तुम ,
कभी बारिश की बूंदो मेँ मेरे संग भीग लेना तुम ,
किसी मोड़ पे मिल जाए कोई
हंस के मिल लेना ,
प्यार की उन गलियों मेँ अब मुलाकात ना होगी ,
हमेशा यूहीं मेरे प्यार की बरसात ना होगी !!

आफरीन बानो

निर्भया….

16 दिसम्बर
(निर्भया रेप केस -2012)

दूर बहुत हूँ तुमसे अम्मा ,
मुझको भी दिख जाओ ना ,
वो लाल रंग की शॉल ओढ़कर ,
अम्मा छत पर आओ ना ….!!

यहीं श्रद्धांजलि होगी मुझको ,
अगर तुम्हे मै देख सकूं ,
मेरे हिस्से की एक मोमबत्ती,
छत पर भी रख जाओ ना ,
वो लाल रंग की शॉल ओढ़कर ,
अम्मा छत पर आओ ना …!!

अंत समय के लिए सहेजा ,
गंगाजल ना पी पाई ,
10 दिन तक तो लड़ी मौत से ,
फिर भी ना मै जी पाई ,
उन 7 दरिंदो ने मेरी सब ,
इक्छाओं का हरण किया ,
नोच लिए सपने आँखों के ,
ना सांसो तक पर रहम किया ,
अपने निर्बल हांथो की ,
एक थपकी ही दे जाओ ना ,
वो लाल रंग की शॉल ओढ़कर ,
अम्मा छत पर आओ ना…!!

बहुत अलग है यह दुनिया …माँ ,
नहीं तुम्हारे किस्सों जैसी ,
स्वर्ग लोक सा नहीं यहां कुछ ,
ना ही कोई परियां दिखतीं ,
शाम के साये मंडराते जब ,
तब तब याद तुम्हारी आती ,
परियों वाली कोई कहानी ,
फिर से आज सुनाओ ना ,
वो लाल रंग की शॉल ओढ़कर ,
अम्मा छत पर आओ ना…!!

आज भी जिंदा हूँ मैं ,
अम्मा… तुम्हारी लोरियों मेँ ,
अलमारी मेँ छोड़ी थी जो मैने,
उन खनकती चूड़ियों मेँ ,
एक पुरानी कुर्ती मेरी ,
खूंटी पे टँगी रह गई ,
मेरे बाद कमरे की खिड़कियाँ ,
सिर पटकती रह गईं ,
सोन चीरैय्या हूँ माँ तेरी ,
अब आजाद भी कर जाओ ना ,
वो लाल रंग की शॉल ओढ़कर ,
अम्मा छत पर आओ ना ,

वो लाल रंग की शॉल ओढ़कर ,
अम्मा छत पर आओ ना !!

-आफरीन बानो

मत सो , अभी जागो …..

मत सो ,
अभी जागो ,
कि तुमको देखना है ,

तारों की रौशनी को अभी कु़छ मद्धम होते ,
किसी की याद मेँ चंदा को पूरी रात जलते ,
कि सबके ख़्वाब पूरे करते हुए जो थक गया है ,
उस टूटते तारे को वजूद खोते !!

मत सो ,
अभी जागो ,
कि तुमको देखना है ,
वो पंक्षी जो अपने झुंड से बिछड़ा हुआ है ,
हर जाते परिंदे को जो एकटक ताकता है ,
किसी की आँखों मेँ ममता तलाशे वो दुलारा ,
इसी नीयत से आसमां मेँ वो नन्हा झांकता है ,

मत सो ,
अभी जागो ,
क़ि तुमको देखना है …!!

ये शीत लहरे कैसे अपना रुख बदलतीं हैं ,
सड़क पर कितनी ही जानें यहां बेमौत मरती हैं ,
क़ि आए एक फ़रिश्ता, जो उन्हे इससे रिहा कर दे ,
ये सड़के भी ऐसी ही दुआएं रोज करतीं हैँ…!!
मत सो अभी जागो,
क़ि तुमको देखना है …

आफरीन बानो